कविता-८ : आब नै ओ बात छै !!

जाहि एकपैरिया बाट पर
लेढा-लेढा भेलहुँ नमहर
कात पड़ल कुहरै एसगर
आइ नै ओ बाट छै
आब नै ओ बात छै !

आब त' पसरल दूर तक
अलकतराक कारी सड़क
दुनु कात पजेबा पाथरक
बनि गेल फुटपाथ छै।
आब नै ओ बात छै !

चारू दिस छै महल अटारी
कतहु हरेलै ओ एकचारी
रंग-पलस्तर सौंसे बारी
ने अंगना छै ने टाट छै।
आब नै ओ बात छै !

खेत छै परती हाल बिना
खरिहान छै नारक टाल बिना
खुट्टा छै सुन्न-सुन्न माल बिना
ने घास छै ने गाछ छै।
आब नै ओ बात छै !

एलैए आब जमाना नवका
गामकें लागल शहरक चस्का
टएर-साइकिलक चलन पुरनका
फटफटियाक ठाठ छै।
आब नै ओ बात छै !
आब नै ओ बात छै !

(तिथि-१०.०२.२०१३)
©पंकज चौधरी "नवलश्री"

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