कविता-४ : जुनि मैथिल बूझू अपनाकें !

मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ जुनि मैथिल बूझू अपनाकें !

कोनो जन्मक पुण्य प्रसाद बूझू, धरती मिथिला सन भेटल
चलु संग-संग कर्मक पथपर, किछु करबा लेल जीवन भेटल
माँ मैथिली "मिथिला" मांगि रहल, जुनि तोडू मायक सपनाकें
मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ...

ई जाति-जातिकें गेंटब छोडू, कियो तऽर कियो उप्पर नै
जाति - धर्म तऽ इन्द्रधनुष थिक, वर्ण - वर्णमे अंतर नै
जाति-धर्म बनि उगै तरेगन, करए इजोर सभ अंगनाकें
मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ...
सादर पान खुआबै कखनो, स्वागत कखनो खराम सँ
सभ छै कर्मक नाच-तमाशा, किछु नै होए छै नाम सँ
नापल-जोखल आखर हितकर, धरु सहेज निज-नपना के
मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ...

विश्व-विजय करब छै संभव संस्कार आ ज्ञानसँ
श्रद्धासँ संबंध बनैत छैक भक्तोकें भगवानसँ
त्याग-समर्पण के नै जानै, विद्यापति आ उगनाकें
मिथिलामे जन्म लेला भरि सँ...

दूषित देहसँ द्वेष उचित नै, दूषित मोन केर दोष अहितकर
संस्कारक बलि-प्रदान दऽ, अपन-अपन जयघोष अहितकर
माँगि रहल श्रमदान "नवल", किछु होए असरि ऐ रचनाकें
मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ...

©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-१५.०६.२०१२)

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