कविता-२ : गामक चुनाव

गामे - गाम चुनाव हेतै, जे किलो छै से पाव हेतै !
मुँह तकता देखब भाव वला, बिन भाववलाकें भाव हेतै !

निर्धनक घर लूट हेतै आ चोरहिंकें सैल्यूट हेतै
कार्यक्रम बनत सभदिन, सभ कारी-कर्मक छूट हेतै
टऽग हनता देखब मोछ्वला, बिन मोछ्वलाकें ताव हेतै !
गामे - गाम चुनाव हेतै…

व्यवहार ने आचार रहत, बस सगतरि भ्रष्टाचार रहत
कुशिक्षा आ आतंक बढ़त, सगरो शोणितक धार बहत
जय-जयकार कूनीतिक आ, नैतिकताक अभाव हेतै !
गामे - गाम चुनाव हेतै…

टोले - टोल जुलुस निकलैत, बस वोटहिंकें गंध तकैत
बाट-घाट होए खोज-पुछारी, अनढनकें सम्बन्ध तकैत
काकक स्वर सरगम साजल, कोइलिक सुरमे काव हेतै !
गामे - गाम चुनाव हेतै…

धोआ धोती खाधिक-कुरता, सगतरि लागल भीड़-भड़क्का
भेद करब तऽ करब कोना कऽ, के नेता के चोर - उचक्का
फेर समाजक चीर-हरण आ शकुनी केर ठग- दाव हेतै !
गामे - गाम चुनाव हेतै…

©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-०२.०७.२००१)

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