कविता-६ : जो-रे-जो अंगरेजिया साल !!
चेतना चैतक बिला रहल छै
ठिठुरल पूसक राति सुतल छै
एलए कलेण्डर गेलए पतरा
जनवरीक छै जागल जतरा
आब शुरू एतहिसँ साल
अभिनन्दन अंगरेजिया साल !
चैत वैशाखक गेलै मिठास
मिठ लागै अंगरेजिया मास
सभ बनि गेलै पछिमक दास
केलक मैथिलीक सत्यानाश
पाग हटा सभ टोप पहिड़ने
पीटैत थपरी ठोकैत ताल
बिसरि गेलै मिथिला-नव-साल !
सियाक अंगना पैसल रावण
लपलप जीह करैत दुहशासन
माए-बहिनक मान बिसरलै
कर-कुटुम्बक सम्मान बिसरलै
जूड़-सितल सलहेश बिसरि क'
सभ फँसल ग्रेगोरियन*-जाल।
मना रहल छै नवका साल !
तों पछिमसँ मिथिलामे एलएं
नोचि-खखोरि मिथिलाके खेलएं
अनलएं संग संस्कार विदेशी
बिसरल सभ व्यवहार स्वदेशी
ऐ बेर जइहें संग लेने जइहें
अपन कुरीतिक गरदा थाल।
मिथिला छोड़ विदेशिया साल !
पछ्बा धुन पर खूब नचौलें
तेरह धरि तेरहो करम पुडौलें
समटि ले मिथिलासँ सभ भाभट
जो अपना घर घुमिहें नाङ्गट
एतै चैत पुनि जागत मिथिला
हम तखन मनेबै नवका साल !
जो-रे-जो अंगरेजिया साल !!
जो-रे-जो अंगरेजिया साल !!
©पंकज चौधरी "नवलश्री"
(तिथि-०१.०१.२०१3)
*जनवरी-दिसम्बर वला कलेंडर "ग्रेगोरियन"क देन अछि
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