कविता-५ : संविधानमे संशोधन हो
संविधानमे संशोधन हो !
प्रावधानमे परिवर्तन हो !
पाप पातर, लोभो लटले, द्वेषो नै देह्गर छलै
भ्रष्टाचार कोखे तखन, आतंको नै बलगर छलै
छल संचरित संवेदना, करेज नै उस्सर छलै
स्वतन्त्र भारतमे एना लोक नै एसगर छलै
सतयुगी अवधारणाक
कलयुगी अवलोकन हो !
संविधानमे संशोधन हो !
जाति-धर्म आधार उचित नै, लोलुप ई उपहार उचित नै
आरक्षण अक्षमकें चाही, आरक्षित सरकार उचित नै
प्रतिभाकें अवरोधित कऽ, मुर्खक जय-जयकार उचित नै
पात्रता जँ होए कलमक, देब हाथ तलवार उचित नै
आरक्षण जँ आवश्यक तऽ
कर्मशील लेल आरक्षण हो !
संविधानमे संशोधन हो !
संस्कृति केर आयात किए, साहित्य भेल एकात किए
सोन चिड़ै छल देश अपन ई, उपटल आइ जयात किए
सृजन-श्रृंगारक बाट छोड़ि, होए मानवता पर घात किए
पएर धरै लेल ठाम देलक जे, तकरे पर फेंकी लात किए
मानव मूल्यक हो सम्मान
संस्कारकें संरक्षण हो !
संविधानमे संशोधन हो !
पक्षपात नै नीति-नियममे, न्यायोचित व्यवहार करी
जाति-पाति आ भेद-भावसँ, नहि देशक बंटाधार करी
जँ पद भेटल तऽ पदवी राखी, भ्रष्ट नै निज आचार करी
घूस - दहेज दुनु अछि घातक, दुन्नूकें प्रतिकार करी
नीक प्रथा केर चलन चलाबी
सभ कुरीतिक उन्मूलन हो !
संविधानमे सशोधन हो !
लोकक धनसँ लड़ैत चुनाव, लोकेसँ फेर करैत उगाही
बाहुबलिक नै चलतै धाही, आब नै सहबै तानाशाही
शंखनादसँ चेता रहल छै, जन-क्रांतिक ई वीर सिपाही
जनतंत्रमे जनता मालिक, नेता नै जनसेवक चाही
बहिष्कार हो राज-नीतिकें
जन-नीतिक अभिनन्दन हो !
संविधानमे सशोधन हो !
प्रावधानमे परिवर्तन हो !
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-१०.०८.२०१२)
***कोलकातासँ प्रकाशित मैथिली आर्थिक पत्रिका "श्री मिथिला"मे प्रकाशित
प्रावधानमे परिवर्तन हो !
पाप पातर, लोभो लटले, द्वेषो नै देह्गर छलै
भ्रष्टाचार कोखे तखन, आतंको नै बलगर छलै
छल संचरित संवेदना, करेज नै उस्सर छलै
स्वतन्त्र भारतमे एना लोक नै एसगर छलै
सतयुगी अवधारणाक
कलयुगी अवलोकन हो !
संविधानमे संशोधन हो !
जाति-धर्म आधार उचित नै, लोलुप ई उपहार उचित नै
आरक्षण अक्षमकें चाही, आरक्षित सरकार उचित नै
प्रतिभाकें अवरोधित कऽ, मुर्खक जय-जयकार उचित नै
पात्रता जँ होए कलमक, देब हाथ तलवार उचित नै
आरक्षण जँ आवश्यक तऽ
कर्मशील लेल आरक्षण हो !
संविधानमे संशोधन हो !
संस्कृति केर आयात किए, साहित्य भेल एकात किए
सोन चिड़ै छल देश अपन ई, उपटल आइ जयात किए
सृजन-श्रृंगारक बाट छोड़ि, होए मानवता पर घात किए
पएर धरै लेल ठाम देलक जे, तकरे पर फेंकी लात किए
मानव मूल्यक हो सम्मान
संस्कारकें संरक्षण हो !
संविधानमे संशोधन हो !
पक्षपात नै नीति-नियममे, न्यायोचित व्यवहार करी
जाति-पाति आ भेद-भावसँ, नहि देशक बंटाधार करी
जँ पद भेटल तऽ पदवी राखी, भ्रष्ट नै निज आचार करी
घूस - दहेज दुनु अछि घातक, दुन्नूकें प्रतिकार करी
नीक प्रथा केर चलन चलाबी
सभ कुरीतिक उन्मूलन हो !
संविधानमे सशोधन हो !
लोकक धनसँ लड़ैत चुनाव, लोकेसँ फेर करैत उगाही
बाहुबलिक नै चलतै धाही, आब नै सहबै तानाशाही
शंखनादसँ चेता रहल छै, जन-क्रांतिक ई वीर सिपाही
जनतंत्रमे जनता मालिक, नेता नै जनसेवक चाही
बहिष्कार हो राज-नीतिकें
जन-नीतिक अभिनन्दन हो !
संविधानमे सशोधन हो !
प्रावधानमे परिवर्तन हो !
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-१०.०८.२०१२)
***कोलकातासँ प्रकाशित मैथिली आर्थिक पत्रिका "श्री मिथिला"मे प्रकाशित
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