बाल कविता-१ : मेघक चोर !!
माँ गै तू ई कहलैं हमरा
मेघमे नै छै पोखरि-डबरा !
झम-झम मेघ अते बरसै छै
कहै कतऽसँ पानि अबै छै?
घैलक-घैल जे उझलि रहल छै
मेघमे चोरबा टहलि रहल छै !
माँ गै माँ ई बात बता तू
सुरुज जनै की कोनो जादू?
पूबसँ उगलै पच्छिम डुबलै
पूबेसँ फेर कोना निकललै?
वएह चोरबा ई काज करै छै
सुरुज उठा कऽ पूब धरै छै !
माँ गै चानक गोल कटोरी
कियो करै छै राति कऽ चोरी
किछु दिन पहिने सउँसे देखल
आइ रातिमे अदहा भेटल
मेघोमे बड्ड चोर रहै छै
चोरा-चोरा जे चान कटै छै !
कतेक तरेगन संग उगै छै
चोरबाकें नहि कियो धरै छै
भरिसक सभ अपने लेल जागल
मनुखक आदत ओकरो लागल
छोड़ की ककरो मुँह लागब हम
आइ राति अपने जागब हम !!!
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-२१.०७.२०१२)
***पाक्षिक इ-पत्रिका "विदेह"मे प्रकाशित
मेघमे नै छै पोखरि-डबरा !
झम-झम मेघ अते बरसै छै
कहै कतऽसँ पानि अबै छै?
घैलक-घैल जे उझलि रहल छै
मेघमे चोरबा टहलि रहल छै !
माँ गै माँ ई बात बता तू
सुरुज जनै की कोनो जादू?
पूबसँ उगलै पच्छिम डुबलै
पूबेसँ फेर कोना निकललै?
वएह चोरबा ई काज करै छै
सुरुज उठा कऽ पूब धरै छै !
माँ गै चानक गोल कटोरी
कियो करै छै राति कऽ चोरी
किछु दिन पहिने सउँसे देखल
आइ रातिमे अदहा भेटल
मेघोमे बड्ड चोर रहै छै
चोरा-चोरा जे चान कटै छै !
कतेक तरेगन संग उगै छै
चोरबाकें नहि कियो धरै छै
भरिसक सभ अपने लेल जागल
मनुखक आदत ओकरो लागल
छोड़ की ककरो मुँह लागब हम
आइ राति अपने जागब हम !!!
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-२१.०७.२०१२)
***पाक्षिक इ-पत्रिका "विदेह"मे प्रकाशित
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