कविता-७ : हमर देश पर-गत्ती-सील !!

जेमहर देखू बीले-बील
हमर देश पर-गत्ती-सील !

भ्रष्टाचार उजागर भेल, त' पोखरिसँ बढि सागर भेल
आतंकक से पंक पड़ल, सभ छै बलिक छागर भेल
फूसि बजै त' ठेहुन-छाबा, जे सच बाजल बागर भेल
कतरि रहल छै सभक जेबी, खांकी खादी आर वकील
हमर देश पर-गत्ती-सील !

जनता आगाँ छुच्छ सोहारी, नेताजीक छनि भरल बखारी
भाग जगै छैक सरकारेक, बनल योजना जँ सरकारी
पाँच बरख धरि कुर्सीक माया, मतदानक बेर खोजपुछारी
निर्धन लाचारककें पूछत खटैत-खटैत छै ढोढी ढील।
हमर देश पर-गत्ती-सील !

धिया कंठ लागल की करतै, टाका छापि कत'सँ अनतै
सभटा खेत जँ एखने गेलै, बांकी धिया बेर की गनतै
नोरसँ भीजल माएक आँचर कोन्टा धए कते ओ कनतै
धिया बाप केर डीह बिकेलै, ब'रक बापकें झोड़ा सील
हमर देश पर-गत्ती-सील !

घूसे पर काटै घुसकुनिया, करिया धन सभके चाही
दलमलित छै दल-दलित सभ, संरक्षण सभके चाही
प्रतिभाक प्रतिकार करैत छै, आरक्षण सभके चाही
व्यथा कथा के कहतै ककरा, सगर व्यवस्था सोहरल पील
हमर देश पर-गत्ती-सील !

©पंकज चौधरी 'नवलश्री'
(तिथि-3०.०१.२०१3)

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