कविता-३ : श्रमक मोल

चली कर्तव्यक पथपर अविचल
बनी श्रमिक, श्रमक सत्कार करी
संतोष रहए संग जिज्ञाशा
लोभ-आ-द्वेषक प्रतिकार करी।

करी कर्म सतत नै किछु बाधक
अप्राप्य प्राप्त करी बनि साधक
बस श्रमसँ सफल करी जीवन
सभ स्वप्न अपन साकार करी।

ने त' सुखसँ बेसी नेह रहए
ने दुःखसँ दुबकल देह रहए
चिंता छोड़ी नित करी चिंतन
संघर्ष सहर्ष स्वीकार करी।

चलि काल संग बनी कालविजयी
संग छूटत पाछू रहि जाएब
जँ श्रमसँ देह चोराएब त'
एहि कालक धारमे बहि जाएब
क्षण भरि नै व्यर्थे नष्ट होए
प्रतिक्षण केर एहन जोगार करी।

सभ लेख विधि केर टलि जाएत
निज श्रमसँ भाग्य बदलि जाएत
संकल्पक मोसिसँ भाग्य लीखि
चलू श्रमसँ स्वयं श्रृंगार करी।

©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-१०.०४.२००२)

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