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Showing posts from November, 2013

बाल कविता-२ : बनि हमजोली खेलै छी !!

धिया पुता हम सभ बुधियार अपनामे अछि खूब दुलार चल गै बहिना, चल रौ यार बँटि-बँटि टोली, खेलै छी बनि हमजोली खेलै छी। दूभि छै पसरल हरियर-हरियर तकरा बीचमे माटि जे उज्जर तए पर घुच्ची खूनि गहिंरगर चल ने गोली खेलै छी बनि हमजोली खेलै छी। गोहिया-पोखरि राजा-पक्की गिल्ली-डंटा चैत-कबड्डी कखनो कितकित धप्पो-गोटी आंखि-मिचौली खेलै छी बनि हमजोली खेलै छी। बीतल बसंत एलए फगुआ खूब कचरबै मिठगर पुआ चल सभ रंग अबीर ल' आ भरि टोलमे होली खेलै छी बनि हमजोली खेलै छी। बोल ओल सन कबकब नै जाति-पातिसँ मतलब नै अपनामे किन्नहुँ झगड़ब नै मिलि पूरा टोली खेलै छी बनि हमजोली खेलै छी !! (तिथि-०७.०३.२०१३) ©पंकज चौधरी (नवलश्री)

बाल कविता-१ : मेघक चोर !!

माँ गै तू ई कहलैं हमरा मेघमे नै छै पोखरि-डबरा ! झम-झम मेघ अते बरसै छै कहै कतऽसँ पानि अबै छै? घैलक-घैल जे उझलि रहल छै मेघमे चोरबा टहलि रहल छै ! माँ गै माँ ई बात बता तू सुरुज जनै की कोनो जादू? पूबसँ उगलै पच्छिम डुबलै पूबेसँ फेर कोना निकललै? वएह चोरबा ई काज करै छै सुरुज उठा कऽ पूब धरै छै ! माँ गै चानक गोल कटोरी कियो करै छै राति कऽ चोरी किछु दिन पहिने सउँसे देखल आइ रातिमे अदहा भेटल मेघोमे बड्ड चोर रहै छै चोरा-चोरा जे चान कटै छै ! कतेक तरेगन संग उगै छै चोरबाकें नहि कियो धरै छै भरिसक सभ अपने लेल जागल मनुखक आदत ओकरो लागल छोड़ की ककरो मुँह लागब हम आइ राति अपने जागब हम !!! ©पंकज चौधरी (नवलश्री) (तिथि-२१.०७.२०१२) ***पाक्षिक  इ-पत्रिका "विदेह"मे प्रकाशित

कविता-१० : व्यवस्था !!

एमहर गेंटल ओमहर गेंटल जेमहर देखू तेमहर गेंटल छोटका परमे नमहर गेंटल के जानए की केमहर गेंटल गेंट-गेंट चकराबय माथा एहन व्यवस्थित गेंटा-गेंटी ! नवकामे छै पुरना फेंटल अरबामे छै उसना फेंटल जे फेंटए तकरो नै बूझल कथीमे गेलै ककरा फेंटल सभ मिझरेलै मूल कथू नै एहन चमत्कृत फेंटा-फेंटी ! (तिथि-२४.०२.२०१३) ©पंकज चौधरी (नवलश्री)

कविता-९ : हमर अस्तित्व !!

हम गरदा नै छी बाटक जे बसातक बाट जोहब हम आ जेमहर-जेमहर ओ बहत हमहूँ बहैत चलि जाएब हम बसात छी बिहारि छी निज बाट हम बहैत रहब अप्पन दिशा अप्पन दशा अपने नियारब अपने बनाएब हमर बाटकें जँ कियो कतहु बनि अवरोधक रोकत त' ओ बहि हमर प्रभावसँ उधिया जेतए हेरा जेतए (तिथि-२०.०२.२०१३) ©पंकज चौधरी "नवलश्री"

कविता-८ : आब नै ओ बात छै !!

जाहि एकपैरिया बाट पर लेढा-लेढा भेलहुँ नमहर कात पड़ल कुहरै एसगर आइ नै ओ बाट छै आब नै ओ बात छै ! आब त' पसरल दूर तक अलकतराक कारी सड़क दुनु कात पजेबा पाथरक बनि गेल फुटपाथ छै। आब नै ओ बात छै ! चारू दिस छै महल अटारी कतहु हरेलै ओ एकचारी रंग-पलस्तर सौंसे बारी ने अंगना छै ने टाट छै। आब नै ओ बात छै ! खेत छै परती हाल बिना खरिहान छै नारक टाल बिना खुट्टा छै सुन्न-सुन्न माल बिना ने घास छै ने गाछ छै। आब नै ओ बात छै ! एलैए आब जमाना नवका गामकें लागल शहरक चस्का टएर-साइकिलक चलन पुरनका फटफटियाक ठाठ छै। आब नै ओ बात छै ! आब नै ओ बात छै ! (तिथि-१०.०२.२०१३) ©पंकज चौधरी "नवलश्री"

कविता-७ : हमर देश पर-गत्ती-सील !!

जेमहर देखू बीले-बील हमर देश पर-गत्ती-सील ! भ्रष्टाचार उजागर भेल, त' पोखरिसँ बढि सागर भेल आतंकक से पंक पड़ल, सभ छै बलिक छागर भेल फूसि बजै त' ठेहुन-छाबा, जे सच बाजल बागर भेल कतरि रहल छै सभक जेबी, खांकी खादी आर वकील हमर देश पर-गत्ती-सील ! जनता आगाँ छुच्छ सोहारी, नेताजीक छनि भरल बखारी भाग जगै छैक सरकारेक, बनल योजना जँ सरकारी पाँच बरख धरि कुर्सीक माया, मतदानक बेर खोजपुछारी निर्धन लाचारककें पूछत खटैत-खटैत छै ढोढी ढील। हमर देश पर-गत्ती-सील ! धिया कंठ लागल की करतै, टाका छापि कत'सँ अनतै सभटा खेत जँ एखने गेलै, बांकी धिया बेर की गनतै नोरसँ भीजल माएक आँचर कोन्टा धए कते ओ कनतै धिया बाप केर डीह बिकेलै, ब'रक बापकें झोड़ा सील हमर देश पर-गत्ती-सील ! घूसे पर काटै घुसकुनिया, करिया धन सभके चाही दलमलित छै दल-दलित सभ, संरक्षण सभके चाही प्रतिभाक प्रतिकार करैत छै, आरक्षण सभके चाही व्यथा कथा के कहतै ककरा, सगर व्यवस्था सोहरल पील हमर देश पर-गत्ती-सील ! ©पंकज चौधरी 'नवलश्री' (तिथि-3०.०१.२०१3)

कविता-६ : जो-रे-जो अंगरेजिया साल !!

चेतना चैतक बिला रहल छै ठिठुरल पूसक राति सुतल छै एलए कलेण्डर गेलए पतरा जनवरीक छै जागल जतरा आब शुरू एतहिसँ साल अभिनन्दन अंगरेजिया साल ! चैत वैशाखक गेलै मिठास मिठ लागै अंगरेजिया मास सभ बनि गेलै पछिमक दास केलक मैथिलीक सत्यानाश पाग हटा सभ टोप पहिड़ने पीटैत थपरी ठोकैत ताल बिसरि गेलै मिथिला-नव-साल ! सियाक अंगना पैसल रावण लपलप जीह करैत दुहशासन माए-बहिनक मान बिसरलै कर-कुटुम्बक सम्मान बिसरलै जूड़-सितल सलहेश बिसरि क' सभ फँसल ग्रेगोरियन*-जाल। मना रहल छै नवका साल ! तों पछिमसँ मिथिलामे एलएं नोचि-खखोरि मिथिलाके खेलएं अनलएं संग संस्कार विदेशी बिसरल सभ व्यवहार स्वदेशी ऐ बेर जइहें संग लेने जइहें अपन कुरीतिक गरदा थाल। मिथिला छोड़ विदेशिया साल ! पछ्बा धुन पर खूब नचौलें तेरह धरि तेरहो करम पुडौलें समटि ले मिथिलासँ सभ भाभट जो अपना घर घुमिहें नाङ्गट एतै चैत पुनि जागत मिथिला हम तखन मनेबै नवका साल ! जो-रे-जो अंगरेजिया साल !! जो-रे-जो अंगरेजिया साल !! ©पंकज चौधरी "नवलश्री" (तिथि-०१.०१.२०१3) *जनवरी-दिसम्बर वला कलेंडर "ग्रेगोरियन"क देन अछि

कविता-५ : संविधानमे संशोधन हो

संविधानमे संशोधन हो ! प्रावधानमे परिवर्तन हो ! पाप पातर, लोभो लटले, द्वेषो नै देह्गर छलै भ्रष्टाचार कोखे तखन, आतंको नै बलगर छलै छल संचरित संवेदना, करेज नै उस्सर छलै स्वतन्त्र भारतमे एना लोक नै एसगर छलै सतयुगी अवधारणाक कलयुगी अवलोकन हो ! संविधानमे संशोधन हो ! जाति-धर्म आधार उचित नै, लोलुप ई उपहार उचित नै आरक्षण अक्षमकें चाही, आरक्षित सरकार उचित नै प्रतिभाकें अवरोधित कऽ, मुर्खक जय-जयकार उचित नै पात्रता जँ होए कलमक, देब हाथ तलवार उचित नै आरक्षण जँ आवश्यक तऽ कर्मशील लेल आरक्षण हो ! संविधानमे संशोधन हो ! संस्कृति केर आयात किए, साहित्य भेल एकात किए सोन चिड़ै छल देश अपन ई, उपटल आइ जयात किए सृजन-श्रृंगारक बाट छोड़ि, होए मानवता पर घात किए पएर धरै लेल ठाम देलक जे, तकरे पर फेंकी लात किए मानव मूल्यक हो सम्मान संस्कारकें संरक्षण हो ! संविधानमे संशोधन हो ! पक्षपात नै नीति-नियममे, न्यायोचित व्यवहार करी जाति-पाति आ भेद-भावसँ, नहि देशक बंटाधार करी जँ पद भेटल तऽ पदवी राखी, भ्रष्ट नै निज आचार करी घूस - दहेज दुनु अछि घातक, दुन्नूकें प्रतिकार करी नीक प्रथा केर चलन चलाबी सभ कुरीतिक उन्मूलन हो ! संविधानमे सशो

कविता-४ : जुनि मैथिल बूझू अपनाकें !

मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ जुनि मैथिल बूझू अपनाकें ! कोनो जन्मक पुण्य प्रसाद बूझू, धरती मिथिला सन भेटल चलु संग-संग कर्मक पथपर, किछु करबा लेल जीवन भेटल माँ मैथिली "मिथिला" मांगि रहल, जुनि तोडू मायक सपनाकें मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ... ई जाति-जातिकें गेंटब छोडू, कियो तऽर कियो उप्पर नै जाति - धर्म तऽ इन्द्रधनुष थिक, वर्ण - वर्णमे अंतर नै जाति-धर्म बनि उगै तरेगन, करए इजोर सभ अंगनाकें मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ... सादर पान खुआबै कखनो, स्वागत कखनो खराम सँ सभ छै कर्मक नाच-तमाशा, किछु नै होए छै नाम सँ नापल-जोखल आखर हितकर, धरु सहेज निज-नपना के मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ... विश्व-विजय करब छै संभव संस्कार आ ज्ञानसँ श्रद्धासँ संबंध बनैत छैक भक्तोकें भगवानसँ त्याग-समर्पण के नै जानै, विद्यापति आ उगनाकें मिथिलामे जन्म लेला भरि सँ... दूषित देहसँ द्वेष उचित नै, दूषित मोन केर दोष अहितकर संस्कारक बलि-प्रदान दऽ, अपन-अपन जयघोष अहितकर माँगि रहल श्रमदान "नवल", किछु होए असरि ऐ रचनाकें मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ... ©पंकज चौधरी (नवलश्री) (तिथि-१५.०६.२०१२)

कविता-३ : श्रमक मोल

चली कर्तव्यक पथपर अविचल बनी श्रमिक, श्रमक सत्कार करी संतोष रहए संग जिज्ञाशा लोभ-आ-द्वेषक प्रतिकार करी। करी कर्म सतत नै किछु बाधक अप्राप्य प्राप्त करी बनि साधक बस श्रमसँ सफल करी जीवन सभ स्वप्न अपन साकार करी। ने त' सुखसँ बेसी नेह रहए ने दुःखसँ दुबकल देह रहए चिंता छोड़ी नित करी चिंतन संघर्ष सहर्ष स्वीकार करी। चलि काल संग बनी कालविजयी संग छूटत पाछू रहि जाएब जँ श्रमसँ देह चोराएब त' एहि कालक धारमे बहि जाएब क्षण भरि नै व्यर्थे नष्ट होए प्रतिक्षण केर एहन जोगार करी। सभ लेख विधि केर टलि जाएत निज श्रमसँ भाग्य बदलि जाएत संकल्पक मोसिसँ भाग्य लीखि चलू श्रमसँ स्वयं श्रृंगार करी। ©पंकज चौधरी (नवलश्री) (तिथि-१०.०४.२००२)

कविता-२ : गामक चुनाव

गामे - गाम चुनाव हेतै, जे किलो छै से पाव हेतै ! मुँह तकता देखब भाव वला, बिन भाववलाकें भाव हेतै ! निर्धनक घर लूट हेतै आ चोरहिंकें सैल्यूट हेतै कार्यक्रम बनत सभदिन, सभ कारी-कर्मक छूट हेतै टऽग हनता देखब मोछ्वला, बिन मोछ्वलाकें ताव हेतै ! गामे - गाम चुनाव हेतै… व्यवहार ने आचार रहत, बस सगतरि भ्रष्टाचार रहत कुशिक्षा आ आतंक बढ़त, सगरो शोणितक धार बहत जय-जयकार कूनीतिक आ, नैतिकताक अभाव हेतै ! गामे - गाम चुनाव हेतै… टोले - टोल जुलुस निकलैत, बस वोटहिंकें गंध तकैत बाट-घाट होए खोज-पुछारी, अनढनकें सम्बन्ध तकैत काकक स्वर सरगम साजल, कोइलिक सुरमे काव हेतै ! गामे - गाम चुनाव हेतै… धोआ धोती खाधिक-कुरता, सगतरि लागल भीड़-भड़क्का भेद करब तऽ करब कोना कऽ, के नेता के चोर - उचक्का फेर समाजक चीर-हरण आ शकुनी केर ठग- दाव हेतै ! गामे - गाम चुनाव हेतै… ©पंकज चौधरी (नवलश्री) (तिथि-०२.०७.२००१)

कविता-१ : माए मैथिली छथि आह्वान करैत !!

बिख घोंटि-घोंटि छथि पीबि रहल मैथिली छथि हिचकैत जीबि रहल आकुल भऽ आइ विवशतावश देखू माए नै विषपान करथि माए मैथिली छथि आह्वान करैत !! नै कम छी एकहु गोट किओ सभ पैघे छी नै छोट किओ बेरा - बेरी सभ राज करू मस्तक पर कीर्तिक ताज धरू अपनहिमे रहू जुनि ओझरायल ई मिथ्या मतदान करैत ! माए मैथिली छथि आह्वान करैत !! माए कानथि सुत निश्चिंत पड़ल सुधि-बुधि बिसरल अचिंत पड़ल चलू पोछब माएक नोर कियो चलू लायब सुख केर भोर कियो नहि देखि दुर्दशा जननी केर चलू छाती अपन उतान करैत ! माए मैथिली छथि आह्वान करैत !! कते कष्ट सहि माय जनम देलक बाजू की ममता कम देलक ? निर्ल्लज बनू नै, कने लाज करू जुनि स्वयं पर एतबा नाज करू जुनि करू एना अभिमान अहाँ अपनहि-अप्पन गुणगान करैत ! माए मैथिली छथि आह्वान करैत !! छी मैथिल एहि पर शान करू अहाँ मैथिलीक सम्मान करू सभ मिलि मैथिलीक प्रचार करू मिथिलाक कीर्ति विस्तार करू सुखद नूतन इतिहास बनत चलु डेग मिला सहगान करैत ! माए मैथिली छथि आह्वान करैत !! ©पंकज चौधरी (नवलश्री) (तिथि-२४.०१.२००१) ***मुम्बईसँ प्रकाशित मैथिली पत्रिका "मैथिली दर्पण"क वर्ष-१, अंक-१मे प्रकाशित ***mithimedia.comसँ प्रका

किछु शब्द गजलक मादे

की होइत अछि गजल ? कविता आ गीत जकाँ “गजल” सेहो साहित्यक एकटा स्वतंत्र विधा थिक। जेना कवितामे भावक प्राथमिकता होइत अछि आ गीतमे सुर-तालके तहिना गजलमे भाव संगे-संग एकटा निश्चित संरचनाक/ढांचाक अनुपालन सेहो करब आवश्यक होइछ। आ से जँ नहि होए त' गजल आ कविता/गीतमे कोनो अंतर नै। मने भाव त' रहब आवश्यक अछिए मुदा गजलमे रचनाक संरचना/ढांचा केर बेशी महत्व अछि। जँ भाव गजलक सृजनक आधार थिक त' छन्दक अनुपालनसँ ओकर यथोचित श्रृंगार होएत अछि। विदेह, अनचिन्हार आखर आ आनोआन श्रोतसँ बहुतो गोटे गजल आ गजलक व्याकरणसँ परिचित हएब आ जे परिचित नहि छी आउ तिनका सभके गजल विधामे प्रयुक्त होमय वला किछु विशिष्ट शब्द सभसँ परिचय करा दी... शेर:- शेर दू पांतिक ओ शब्द संयोजन या संरचना थिक जाहिसँ पूर्ण भाव अभिव्यक्त होइछ। एकटा आदर्श गजलमे कमसँ कम पांच गोट शेर होमक चाही। मतला:- कोनो गजलक पहिल शेरकें ओहि गजलक मतला कहल जाएत अछि। > गजलमे मतला वला शेरक बड्ड महत्व छैक। अही शेरसँ गजलक रदीफ आ कफियाक निर्धारण होएत छै। आ तदुपरांत ओहि गजलक बांकी सभ शेरक दोसर पांतिमे एकर अनुपालन करब आवश्यक रहैत अछि। रदीफ:-   मतला वला शेरक दुनु